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"प्रगतिवादी साहित्यक यात्रामे एकटा नवका इतिहास : “मिथिला मुक्तिके संनेश”" :: majheri.com

प्रगतिवादी कला, संस्कार, सस्कृति आओर जनसाहित्य समाज रुपान्तरके एकटा बहुत भारी नमहर बैचारिक हतियार अइछ । प्रगतिशिल समाजिक जीवन निर्माणमे प्रगतिवादी कला साहित्यके बहुत नमहर भुमकिा रहैत अइछ । गलत संस्कार, संस्कृति आओर बुर्जुवा कला साहित्यके भण्डाफोर करैत जखन नयाँ ढंगके प्रगतिवादी यर्थाथवादी कला, साहित्यमे नवका इतिहास थपैत अइछ तखन हमर मन खुशीसे गदगद होइत अइछ । सामाजवादी यर्थाथवादी कला आ जनसाहित्यक सुन्दरता उपर अहेन निमन निखारल कलमक प्रस्तुतिसे जनसाहित्य दुनियाँमे थप उत्साह और मनोबल पैदा केने अइछ । नेपाली सामाजमे अहेन निमन निखारल कलम अधिकारमे पछाडि परल मधेशके जन्मभुमीसे निकलैत रहत त निश्चित रुपमे नेपाली और मधेशी जनता सबके मुहार फेर सकैत अइछ । भौतिकवादी आओर द्धन्दवादी दृष्टिकोणसे भरल आमुल परिवर्तन लछित अहेन वर्गचेत, वर्गप्रेम जनसाहित्यसे राष्ट्रा आ जनताके दुःख, पिडा, लक्ष्य, उदेश्य, ईच्छा, आकांक्षा, लगयतक सारा चिजके रक्षा करैत अइछ । जखन नेपाली जनताके हरेक क्षेत्र उपर सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनितिक आओर कानुनी रुपमे सेहो एकलौटी सासन चलाबै खातिर राज्यपक्षसे दलबलके प्रयोग कैरके कठिनसेकठिन दमन, शोष...

मिथिला के तरुआ by vidyapati.org

मिथिला के तरुआ सौजन्य : निखिल रंजन झा   भिंडी भिनभिनायत भिंडी के तरुआ, आगु आ ने रे मुँह जरुआ हमरा बिनु उदास अछि थारी, करगर तरुआ रसगर तरकारी   कदीमा गै भिंडी तोईं चुप्पहि रह, एहि सऽ आगु किछु नहि कह लस-लस तरुआ, फचफच झोर, नाम सुनतहि खसतय नोर खायत जे से खोदत दाँत, देखतहि तोरा सिकुड़ल नाक हम कदीमा नमहर मोंट, भागलैं नहि तऽ काटबौ झोंट   आलू जमा देबय हम थप्पड़ तड़-तड़, केलहिन के सब हमर परितर छै जे मर्दक बेटा तोय, आबि के बान्ह लंगोटा तोय की बाजति छैं माटि तर स', बाजय जेना जनाना घर स' हमरे पर अछि दुनिया राजी, आब ज' बाजलैं बान्हबौ जाबी हमर तरुआ लाजवाब, नाम हमर अछि लाल गुलाब   परवल बहुत दूर स' आबि रहल छी, ताहि हेतु भऽ गेलऔं लेट हम्मर तरुआ सेठ खायत अछि, ताहि हेतु नमरल छन्हि पेट दु फाँक कऽ भरि मसाला, दियौ तेल नहि गड़बड़ झाला दालि भात पर झटपट खाउ, भेल देर औफिस चलि जाउ [[.. Read More at मिथिला के तरुआ by vidyapati.org..]]