November 9, 2011

"मैं और मेरी कवितायेँ... " :: sandhyakavyadhara.blogspot.com



आज फिर जी लिया
फुर्सत के पलों में
खुद को
आज फिर देखा
खुले आसमान में
उड़ते पक्षियों को
हर दिशा में
स्वच्छंद होकर
मैं भी उड़ चली
धीरे-धीरे
उनके पीछे-पीछे...

देखो
लौट आये हैं
सबके सब
थक हारकर
अपने-अपने घोसलों में
पूरी करके
अपनी-अपनी खोज...

और मैं
उड़ रही हूँ अब भी
बिना रुके
बिना थके
पंख फैलाये
अनंत आकाश में
अब भी यहीं हूँ
एक तलाश में...

मेरे लिए महत्वपूर्ण है
गति और निरंतरता
रफ़्तार धीमी हो
या हो तेज़
पहुंचा ही देती है
गंतव्य तक
एक ऐसा गंतव्य
जहाँ पहुंचकर भी लगता है
बाकी है अब भी कुछ
कुछ शेष है अभी भी ...

यही भावना है
जो बल देती है
मेरे पंखों को
जोश भरती है
मेरी उड़ान में
एक अनंत उड़ान
मेरे विचारों की उड़ान.... 

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